सड़क समाचार: वाराणसी,आपका स्वागत है. ब्रेकिंग न्यूज. जहाँ धर्म कमजोर हुआ, वहाँ अपराध भी कम होते गये!
भारत जैसे देशों में एक पुराना, चिपचिपा झूठ लगातार फैलाया जाता है—कि धर्म और आस्था इंसान को अच्छा बनाते हैं, और नास्तिकता का मतलब है अपराध, अराजकता और नैतिक पतन। लेकिन रुकिए, ज़रा आँकड़ों पर नज़र डालिए, और दुनिया का नक्शा खोलिए—सच्चाई कुछ और ही है!
चलते हैं उन देशों की ओर जहाँ “भगवान” का नाम सुनते ही लोग पूछते हैं—“वो किस डिपार्टमेंट में काम करता है?”
नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, जापान, ऑस्ट्रेलिया, चीन, वियतनाम जैसे देशों में 70% से ज्यादा लोग किसी देवता, पैगंबर या परलोक में विश्वास नहीं रखते।
जापान में तो 86% लोग खुद को नास्तिक या अग्नोस्टिक मानते हैं, लेकिन वहीं अपराध इतने कम हैं कि पुलिसवाले अपने काम के बीच Sudoku और कॉफ़ी से वक्त बिताते हैं।
नॉर्वे में 2023 में पूरे साल भर में सिर्फ 40 हत्याएँ हुईं—जो भारत के किसी एक ज़िले में एक हफ्ते में हो सकती हैं!
इन देशों में अपराध क्यों कम हैं? क्योंकि वहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, घर और रोजगार जैसे बुनियादी अधिकार काफ़ी हद तक पहले से मिले हुए हैं, ये वहां लक्ज़री नहीं, अधिकार माने जाते हैं।
अब नज़र डालिए उन देशों की तरफ जहाँ धर्म हर गली, हर सरकारी योजना और हर सोशल मीडिया पोस्ट में गूंजता है—भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश।
यहाँ धर्म का नेटवर्क 5G से भी तेज़ है—मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, तीर्थयात्रा, भगवा रैलियाँ, हरे झंडे, गेरुए महंत—धर्म हर जगह है, मगर इंसाफ़, सुरक्षा और इंसानियत कहीं नज़र नहीं आती।
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राधे श्याम यादव
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इन देशों में बलात्कार, मॉब लिंचिंग, सांप्रदायिक हिंसा, भ्रूण हत्या, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और घोटालों का बोलबाला है—और सरकारें इन अपराधों पर धर्म का पर्दा डाल देती हैं।
पाकिस्तान में धर्म के नाम पर हत्या सामान्य बात हो गई है, बांग्लादेश में कट्टरता और लैंगिक हिंसा बढ़ती जा रही है, और भारत में धर्म और राजनीति का गठबंधन एक “पवित्र अपराध तंत्र” बन चुका है।
अब सोचिए—अगर धर्म से ही अपराध रुकते, तो पाकिस्तान अब तक जन्नत होता, भारत में हर गली स्वर्ग बन चुकी होती, और बांग्लादेश में नैतिकता के झरने बह रहे होते!
असल में क्या हो रहा है?
धर्म का इस्तेमाल लोगों को डराने, बाँटने और असली मुद्दों से भटकाने के लिए किया जा रहा है, जबकि जिन देशों में अधिकतर लोग नास्तिक हैं उन्हें, भाग्य, पुनर्जन्म के कर्म, स्वर्ग-जन्नत, गाय-गोबर आदि के नाम से वेवकूफ बनाया जाना मुश्किल होता है।
पिछड़े देशों में अपराध का असली कारण क्या है?
इसकी जड़ में है वह शोषणकारी तंत्र जो इंसान को इंसान नहीं रहने देता। जहाँ रोटी किस्मत का खेल बन जाए, इलाज अमीरों की चीज़ हो, और शिक्षा केवल मुनाफ़े का धंधा हो—वहाँ अपराध पनपेगा ही। जहाँ मेहनत की कमाई पर कुछ लोग ऐश करते हैं, वहाँ बाकी लोग या तो गुलाम बनते हैं, या अपराधी, या आत्महत्या कर लेते हैं।
इसके अलावा जो सामंती सोच है—जात-पात, मर्दवाद, खानदानी अहंकार और धार्मिक श्रेष्ठता की दुकान—वो इस अपराध-तंत्र को सामाजिक मान्यता भी देती है।
दरअसल, समाज को भगवान नहीं, इंसाफ़ चाहिए।
रोटी, शिक्षा, इलाज और बराबरी चाहिए।
जहाँ ये नहीं मिलेगा, वहाँ अपराध ज़रूर मिलेगा—चाहे जितने भी मंदिर-मस्जिद बना लो या नमाज़ पढ़ लो।
असल लड़ाई भगवान और नास्तिकता की नहीं है।
असल लड़ाई है उस पूंजीवादी ढांचे से जो इंसान की ज़रूरतों को धंधा बना देता है और धर्म को उसका पर्दा।
इसलिए अगर अपराध मिटाना है, तो मंदिर या मस्जिद नहीं—उस व्यवस्था को बदलना होगा जो इंसान को जीने का हक़ ही नहीं देती।
भगवान को मानना या न मानना व्यक्तिगत निर्णय है।
लेकिन इंसान को इंसान बनाए रखने की उम्मीद जिन सरकारों से की जाती थी वे या तो भ्रष्टाचार में डूबी हुई हैं या फिर समाज को अंधभक्ति में डुबो के अपना अपराधतन्त्र खड़ा कर रहे हैं ।
ऐसे में इन्साफ़पसंद आवाम को एकजुट होकर संघर्ष कर अपने हकों को हासिल करने की ज़रूरत है—तभी एक बेहतर समाज का निर्माण होगा।
—धर्मेन्द्र आज़ाद
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