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| Ajay roy |
*हाल में योगेंद्र यादव का जेएनयू में दिया राजनीतिक सिद्धांत पर व्याख्यान, उनके व्यापक बौद्धिक रुझान को प्रतिबिंबित करता है।* वे भारत बचाओ आंदोलन से जुड़े हैं और स्वराज इंडिया के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं।
उनका तर्क है कि राजनीतिक सिद्धांत को केवल बौद्धिक दायरे तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे राजनीतिक कार्रवाई की तरफ ले जाना चाहिए। उनकी बौद्धिक गहराई भारतीय राजनीतिक चिंतन के संदर्भात्मक अध्ययन में निहित है, जहाँ वे सिद्धांत को समाज और राजनीति से जोड़ते हैं। अपने वक्तव्य में उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि राजनीतिक सिद्धांत को पश्चिम से उधार लिए गए ढाँचों के बजाय भारत के जीवंत लोकतांत्रिक अनुभवों में निहित होना चाहिए। उन्होंने राजनीतिक कल्पनाशीलता के क्षरण, लोकतांत्रिक मानकों के कमजोर होने और सिद्धांत व राजनीतिक व्यवहार के बीच बढ़ती दूरी की सही पहचान की। उनका भाषण लोकतंत्र में व्याप्त नैतिक और संस्थागत पतन की ओर आकर्षित करता है।
हालाँकि, उनके पूरे वक्तव्य में मुझे कहीं भी राजनीतिक अर्थव्यवस्था का संदर्भ नहीं मिला। जबकि समकालीन भारत को समझने के लिए कोई भी पर्याप्त राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक अर्थनीति को अपने केंद्र में रखे बिना अधूरा है। भारत में लोकतंत्र केवल नैतिक गिरावट का शिकार नहीं हो रहा है, बल्कि *इसे संरचनात्मक रूप से कॉरपोरेट–हिंदुत्व गठजोड़ द्वारा पुनर्गठित किया जा रहा है।* जो राज्य स्वायत्त होना चाहिए था, वह स्वयं इस गठजोड़ का हिस्सा बनता जा रहा है।
भारतीय राजनीतिक चिंतन कभी भी केवल नैतिक या संवैधानिक नहीं रहा है। यह उपनिवेशवाद, सामंतवाद, जाति उत्पीड़न और साम्राज्यवादी वर्चस्व के खिलाफ संघर्षों के बीच गढ़ा गया है। आंबेडकर ने संविधान को संघर्ष के औज़ार के रूप में देखा। गांधी की राजनीतिक नैतिकता, उपनिवेश-विरोधी संघर्ष से जुड़ी थी। मार्क्सवादी परंपरा ने लोकतंत्र को संघर्ष का मैदान माना। *भारतीय राजनीतिक सिद्धांत हमेशा टकरावपूर्ण, जोखिम उठाने वाला और वर्चस्व-विरोधी रहा है।*
ऐसे समय में जब भारतीय राज्य खुलकर हिंदुत्व और पूंजी के हितों की सेवा कर रही है, भारतीय राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ केवल शब्दावली में बदलाव नहीं हो सकता। उसे जन लोकतंत्र और समावेशी राष्ट्रवाद के लिए एक व्यापक जन-लोकतांत्रिक योजना से जुड़ना होगा।
अखिलेंद्र प्रताप सिंह
संस्थापक सदस्य, एआईपीएफ
दिनांक : 6 जनवरी, 2026
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