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09/02/2026

अमेरिका भारत व्यापारिक संधि

फ़रवरी 09, 2026 0
सड़क समाचार: वाराणसी,आपका स्वागत है. ब्रेकिंग न्यूज   

अमेरिका भारत व्यापारिक संधि पर ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट का वक्तव्य

अमेरिका और भारत के बीच में जो व्यापारिक संधि हुई है, उसने पूरे देश में एक बड़ा भ्रम पैदा कर दिया है। देश की लोकतांत्रिक ताकतों द्वारा यह कहा जा रहा है कि भारत ने कृषि और डेयरी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोल दिया है। अमेरिका से खाद्यान्न और डेयरी उत्पाद बड़े पैमाने पर आयात किए जायेंगे। अमेरिकी कृषि मंत्री के द्वारा भी इस आशय का वक्तव्य दिया गया है। राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा यह कहना कि भारत अब रूस जैसे मित्र देशों से तेल नहीं खरीदेगा भी भारत के लिए नुकसानदेह है। एआईपीएफ की राष्ट्रीय कार्य समिति ने कहा है कि यदि ऐसा हुआ है तो यह भारत के आम नागरिकों, मजदूरों, किसानों हितों के साथ देश की आर्थिक सम्प्रभुता के लिए भी बड़ा संकट पैदा करेगा। एआईपीएफ ने कहा कि इस समझौते में भारतीय समानों पर टैरिफ लगाने की बात आ रही है। यह विश्व व्यापार संगठन द्वारा तय नियमों के विरुद्ध है। इससे भारत के टेक्सटाइल, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल आदि क्षेत्रों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न होगा।ऐसे में ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट देश के उन सभी राजनीतिक दलों, संगठनों के साथ है जो इस व्यापारिक समझौते को संसद के पटल पर रखने की मांग उठा रहे हैं।

राष्ट्रीय कार्य समिति की तरफ से,

एस. आर. दारापुरी, 
राष्ट्रीय अध्यक्ष 
ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट।

02/02/2026

बजट 2026

फ़रवरी 02, 2026 0
सड़क समाचार: वाराणसी,आपका स्वागत है. ब्रेकिंग न्यूज

• लोगों की क्रय शक्ति को कमजोर करता बजट
• देश में मंदी, मंहगाई, आर्थिक संकट और बढ़ेगा 
• एआईपीएफ की केंद्र सरकार के बजट
रुपये की गिरती कीमत 



पर प्रतिक्रिया

लखनऊ, 02/02/2026। 

आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट की राष्ट्रीय कार्य समिति ने कल पेश बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए जारी बयान में कहा कि केंद्र सरकार द्वारा कल संसद में 53 लाख 40 हजार करोड़ का बजट पेश किया गया है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जीडीपी अनुमान 393 लाख करोड़ है। बजट के संसाधन जुटाने में 16 लाख करोड़ की भारी-भरकम राशि उधार व अन्य देयताएं शामिल है। जिसका नतीजा है कि देश में कर्ज तेजी से बढ़ा है और बजट का एक बड़ा हिस्सा 14 लाख करोड़ ब्याज अदायगी में खर्च हो जाता है। इसी तरह कारपोरेट टैक्स का योगदान 12 लाख करोड़ है जोकि आम तौर पर मध्य वर्ग द्वारा अदा किए जाने वाले इनकम टैक्स 14.6 लाख करोड़ से कम है। पूंजी गत व्यय भी जिसे बढ़ाया गया है वह भी मुख्यतः नेशनल हाईवे व रेलवे कारिडोर जैसे मदों पर है जिसका लाभ कारपोरेट व धनाढ्य वर्ग को होगा। इस पूंजी गत व्यय में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि क्षेत्र के इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बेहद कम है। स्पष्ट है कि संसाधन जुटाने में आम आदमी पर बोझ डाला गया है जबकि उनके ऊपर खर्च यथावत है जोकि पहले से ही बेहद कम है। 
          बजट शेयर के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट है कि शिक्षा में 2.54 फीसद से 2.60 फीसद व स्वास्थ्य 1.94 फीसद से 1.95 फीसद मामूली बढ़ोतरी हुई है, जो मुद्रा स्फीति की तुलना में कम ही हुई है। इसके ग्रामीण विकास 5.25 फीसद से 5.10 फीसद, कृषि व संबद्ध कार्यकलाप 3.13 फीसद से 3.04 फीसद, खाद्य सब्सिडी 4.62 फीसद से 4.25 फीसद, उर्वरक सब्सिडी 3.31 फीसद से 3.19 फीसद जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मामूली गिरावट आई है। स्पष्ट है कि सरकार ने सामाजिक सुरक्षा की जवाबदेही से पल्ला झाडा है।
         बहुप्रचारित न्यू इंटर्नशिप प्रोग्राम में 10831 करोड़ आवंटित बजट में महज 526 करोड़ ही खर्च हो सकता पाया, इस मद में बजट घटाकर 4788 करोड़ कर दिया गया। इसी तरह एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय में आवंटित 7089 करोड़ में 4900 करोड़, स्किल इंडिया में 2700 करोड़ में महज 200 करोड़ रुपए खर्च किए गए। 
        बजट में सरकारी विभागों में रिक्त पदों को भरने, स्कीम वर्कर्स के लिए सम्मानजनक वेतनमान, सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाली जैसी न्यूनतम मांगों को हल करने का जिक्र तक नहीं है। 
       कुल मिलाकर बजट की दिशा कारपोरेट व धनाढ्य वर्ग के हितों के अनुरूप है। जरूरत थी कि कारपोरेट व धनाढ्य वर्ग की संपत्ति पर समुचित टैक्स लगाया जाता जिससे विदेशी कर्ज पर निर्भरता भी घटती और रोजगार सृजन, सामाजिक कल्याण, छोटे मझोले उद्योगों और कृषि जैसे क्षेत्रों में निवेश में बढ़ोतरी होती, जिससे आम नागरिकों की क्रय शक्ति बढ़ती और महंगाई व मंदी से देश उबरता। लेकिन यह न करके सरकार के बजट से लोगों की क्रय शक्ति, सामाजिक सुरक्षा घटेगी और देश गंभीर आर्थिक संकट का सामना करेगा।

राष्ट्रीय कार्य समिति की तरफ से!

एस. आर. दारापुरी 
राष्ट्रीय अध्यक्ष 
ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट। 
9415164845

31/01/2026

धर्मेन्द्र आज़ाद

जनवरी 31, 2026 0
सड़क समाचार: वाराणसी,आपका स्वागत है. ब्रेकिंग न्यूज.                                                                                              जहाँ धर्म कमजोर हुआ, वहाँ अपराध भी कम होते गये!      

भारत जैसे देशों में एक पुराना, चिपचिपा झूठ लगातार फैलाया जाता है—कि धर्म और आस्था इंसान को अच्छा बनाते हैं, और नास्तिकता का मतलब है अपराध, अराजकता और नैतिक पतन। लेकिन रुकिए, ज़रा आँकड़ों पर नज़र डालिए, और दुनिया का नक्शा खोलिए—सच्चाई कुछ और ही है!

चलते हैं उन देशों की ओर जहाँ “भगवान” का नाम सुनते ही लोग पूछते हैं—“वो किस डिपार्टमेंट में काम करता है?”
नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, जापान, ऑस्ट्रेलिया, चीन, वियतनाम जैसे देशों में 70% से ज्यादा लोग किसी देवता, पैगंबर या परलोक में विश्वास नहीं रखते।
जापान में तो 86% लोग खुद को नास्तिक या अग्नोस्टिक मानते हैं, लेकिन वहीं अपराध इतने कम हैं कि पुलिसवाले अपने काम के बीच Sudoku और कॉफ़ी से वक्त बिताते हैं।
नॉर्वे में 2023 में पूरे साल भर में सिर्फ 40 हत्याएँ हुईं—जो भारत के किसी एक ज़िले में एक हफ्ते में हो सकती हैं!
इन देशों में अपराध क्यों कम हैं? क्योंकि वहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, घर और रोजगार जैसे बुनियादी अधिकार काफ़ी हद तक पहले से मिले हुए हैं, ये वहां लक्ज़री नहीं, अधिकार माने जाते हैं।

अब नज़र डालिए उन देशों की तरफ जहाँ धर्म हर गली, हर सरकारी योजना और हर सोशल मीडिया पोस्ट में गूंजता है—भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश।
यहाँ धर्म का नेटवर्क 5G से भी तेज़ है—मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, तीर्थयात्रा, भगवा रैलियाँ, हरे झंडे, गेरुए महंत—धर्म हर जगह है, मगर इंसाफ़, सुरक्षा और इंसानियत कहीं नज़र नहीं आती।
राधे श्याम यादव 



इन देशों में बलात्कार, मॉब लिंचिंग, सांप्रदायिक हिंसा, भ्रूण हत्या, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और घोटालों का बोलबाला है—और सरकारें इन अपराधों पर धर्म का पर्दा डाल देती हैं।
पाकिस्तान में धर्म के नाम पर हत्या सामान्य बात हो गई है, बांग्लादेश में कट्टरता और लैंगिक हिंसा बढ़ती जा रही है, और भारत में धर्म और राजनीति का गठबंधन एक “पवित्र अपराध तंत्र” बन चुका है।

अब सोचिए—अगर धर्म से ही अपराध रुकते, तो पाकिस्तान अब तक जन्नत होता, भारत में हर गली स्वर्ग बन चुकी होती, और बांग्लादेश में नैतिकता के झरने बह रहे होते!

असल में क्या हो रहा है?
धर्म का इस्तेमाल लोगों को डराने, बाँटने और असली मुद्दों से भटकाने के लिए किया जा रहा है, जबकि जिन देशों में अधिकतर लोग नास्तिक हैं उन्हें, भाग्य, पुनर्जन्म के कर्म, स्वर्ग-जन्नत, गाय-गोबर आदि के नाम से वेवकूफ बनाया जाना मुश्किल होता है। 

पिछड़े देशों में अपराध का असली कारण क्या है?
इसकी जड़ में है वह शोषणकारी तंत्र जो इंसान को इंसान नहीं रहने देता। जहाँ रोटी किस्मत का खेल बन जाए, इलाज अमीरों की चीज़ हो, और शिक्षा केवल मुनाफ़े का धंधा हो—वहाँ अपराध पनपेगा ही। जहाँ मेहनत की कमाई पर कुछ लोग ऐश करते हैं, वहाँ बाकी लोग या तो गुलाम बनते हैं, या अपराधी, या आत्महत्या कर लेते हैं।
इसके अलावा जो सामंती सोच है—जात-पात, मर्दवाद, खानदानी अहंकार और धार्मिक श्रेष्ठता की दुकान—वो इस अपराध-तंत्र को सामाजिक मान्यता भी देती है।

दरअसल, समाज को भगवान नहीं, इंसाफ़ चाहिए।
रोटी, शिक्षा, इलाज और बराबरी चाहिए।
जहाँ ये नहीं मिलेगा, वहाँ अपराध ज़रूर मिलेगा—चाहे जितने भी मंदिर-मस्जिद बना लो या नमाज़ पढ़ लो।
असल लड़ाई भगवान और नास्तिकता की नहीं है।
असल लड़ाई है उस पूंजीवादी ढांचे से जो इंसान की ज़रूरतों को धंधा बना देता है और धर्म को उसका पर्दा।

इसलिए अगर अपराध मिटाना है, तो मंदिर या मस्जिद नहीं—उस व्यवस्था को बदलना होगा जो इंसान को जीने का हक़ ही नहीं देती।

भगवान को मानना या न मानना व्यक्तिगत निर्णय है। 

लेकिन इंसान को इंसान बनाए रखने की उम्मीद जिन सरकारों से की जाती थी वे या तो भ्रष्टाचार में डूबी हुई हैं या फिर समाज को अंधभक्ति में डुबो के अपना अपराधतन्त्र खड़ा कर रहे हैं ।
ऐसे में इन्साफ़पसंद आवाम को एकजुट होकर संघर्ष कर अपने हकों को हासिल करने की ज़रूरत है—तभी एक बेहतर समाज का निर्माण होगा।

—धर्मेन्द्र आज़ाद

26/01/2026

समाजशास्त्री डॉ. -राधेश्याम यादव

जनवरी 26, 2026 0
सड़क समाचार: वाराणसी,आपका स्वागत है. ब्रेकिंग न्यूज.       
Dr. Radhey shyam Yadav 

                                                                                               UGC ने पिछडी जाती के छात्रों के लिए एक कानून बनाया है जिसमें उन्हे उनका हक हिस्सेदारी को देने का प्राविधान बनाया गपा है इसके के अन्तर गत सभी OBC के पद को OBC जाति द्वारा ही भरा जायेगा यह का कानून बन गया है अब उच्च जाति के लोग ठाकुर ब्राह्मण विरोध कर रहे है और पिछड़ी जाति के शिक्षित लोगों को यह प्रविधान मालूम ही नही हो रहा है बस कुर्मी मौर्या राजभर पाल कुम्हार चौहान के लोग एक जुट हो कर समाजवादी के साथ हो तभी उनका हक मिल सकता है जैसे अशसूची जाति जनजाति का हक मिल रहा है वैसे ही OBC के छात्रो का भी हक मिलने लगे गा ।
आज अभी नियम लागू हुआ है और उच्च जाति के लोग पिछड़ी जाति के हक का विरोध करने लगे है आप जागों अपने हक को पहचानो बाबा साहब डा अम्बेडकर जी को याद करो और UGC के नियम का अध्ययन करो -
डा. राधे श्याम यादव समाज वैज्ञानिक वाराणसी

12/01/2026

अंधराष्ट्रवाद,इस्लामोफोबिया

जनवरी 12, 2026 0
सड़क समाचार: वाराणसी,आपका स्वागत है. ब्रेकिंग न्यूज   

                                                                                        संघी मनुवादी फासीवादी ताकतों के पोस्टर बॉय अजीत डोभाल ने विकसित भारत पर युवाओं को प्रवचन देते हुए कहा कि हमें इतिहास में हुए अपमान का बदला लेना है।बदला लेने से हम ताकतवर बनेंगे।उन्होंने ये भी कहा कि हमारे पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी।बहुत फांसी पर चढ़े।हमने कभी किसी की सभ्यता या मंदिर नहीं तोड़ा,लेकिन हमारे सैकड़ों मंदिर तोड़े गए।हमने कभी अपनी प्रतिरक्षा पर जोर नहीं दिया।

 भगवा गिरोह के इस सितारे को   धुरंधर जैसी संघी एजेंडा वाली  फिल्मों के जरिए सुपरमैन के रूप में पेश किया जा रहा है।अंधराष्ट्रवाद,इस्लामोफोबिया और हिंसक हिंदुत्व का जहर नवीन नौकरशाहों को पिलाने का काम बखूबी ये संघी प्रचारक कर रहा है।लेकिन इस भगवा प्रवक्ता ने यह नहीं बताया कि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के खिलाफ लड़ाई में आर एस एस और हिन्दू महासभा के कितने लोगों को फांसी पर झुलाया गया है।हां,ये जरूर है कि संघ परिवार तो अंग्रेजों की गुलामी को गुलामी नहीं मानता बल्कि मुगलों के खिलाफ संघर्ष को ही आजादी की लड़ाई मानता रहा है।इसीलिए RSS और हिन्दू महासभा ने अपने जन्म के समय से ही  लगातार अंग्रेजों की गुलामी की थीऔर देश से गद्दारी की थी। अजीत डोभाल ने यह भी नहीं बताया कि सल्तनत काल में और मुगल काल में  सुलतानों और बादशाहों के दरबार में कई राजपूत राजाओं के लिए अपने राज्य की प्रतिरक्षा के मुद्दे से ज्यादा दिल्ली दरबार में अपनी हाजरी लगाकर अपनी धन संपदा में वृद्धि करना ज्यादा जरूरी था।
दूसरी बात ये है कि संघी फासिस्ट ,भारत के इतिहास और संस्कृति को विकृत व साम्प्रदायिक बनाने में जुटे हैं इसीलिए वो सत्य को छुपाते हैं।सत्य यह है कि  महमूद गजनवी के अलावा भारत के गैर मुस्लिम राजा महाराजाओं में से कई ने (जैसे कि कश्मीर के राजा ने ) मंदिर तोड़क अधिकारी और मंत्री नियुक्त किए थे। जो अपने राजा के निर्देश पर प्रतिद्वंद्वी राजाओं के कुलदेवता के मंदिर पर  आक्रमण कर उसको ध्वस्त करते और मंदिर की धन संपदा को लूट लेते।और ऐसा करने के जरिए दुश्मन राजा के सम्मान और गरिमा को चोट पहुंचाते।अब बात समझ में आती है कि कैसे अधिकांश IAS/ IPS   कैडर ( गैर भाजपा शासित राज्यों में भी) का भगवाकरण मुकम्मल हो रहा है।जो शपथ संविधान को रक्षा करने की लेते हैं,लेकिन जी जान से लागू करते हैं भागवत- मोदी- शाह के संघी मनुवादी फासीवादी एजेंडे को।

08/01/2026

डा.राधे श्याम यादव - वाराणसी

जनवरी 08, 2026 0
सड़क समाचार: वाराणसी,आपका स्वागत है. ब्रेकिंग न्यूज

जब चुनाव आता है तब ED का भूत आता है इस भूत को सात ताला मे बन्द करो नही तो वह दीन दूर नही जब जनता हाथ मे डंडा लेकर ED को दौडा लेगी -
जब की पहले चुनाव के समय आचार संहिता लागू हो जाता था कोई भी नई योजना लागू नही होती थी तब ED की भूत कैसे निकलता है जब जहाँ चुनाव होता है वहा के बड़े नेता पर ED का छापा लगा कर नेता को बदना करने का काम किया जाने लगा है जो गलत है ED चुनाव से पहले या चुनाव के बाद अपना कार्य शुरू करे - लालू प्रसाद यादव जी को बहुत परेशान कर चुके हो अब ममता दीदी को परेशान करने की योजना बना रहे हो जो गलत है ED भाजपा के बड़े नेता बड़े अधिकारी जो करोडों रूपये का घपला किये है उनके उपर कब ED अपना छापा दिखायेंगी .
समाज वैज्ञानिक डा.राधे श्याम यादव - वाराणसी

07/01/2026

अखिलेंद्र

जनवरी 07, 2026 0
सड़क समाचार: वाराणसी,आपका स्वागत है. ब्रेकिंग न्यूज*दृष्टिकोण* 
Ajay roy


*हाल में योगेंद्र यादव का जेएनयू में दिया राजनीतिक सिद्धांत पर व्याख्यान, उनके व्यापक बौद्धिक रुझान को प्रतिबिंबित करता है।* वे भारत बचाओ आंदोलन से जुड़े हैं और स्वराज इंडिया के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। 
उनका तर्क है कि राजनीतिक सिद्धांत को केवल बौद्धिक दायरे तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे राजनीतिक कार्रवाई की तरफ ले जाना चाहिए। उनकी बौद्धिक गहराई भारतीय राजनीतिक चिंतन के संदर्भात्मक अध्ययन में निहित है, जहाँ वे सिद्धांत को समाज और राजनीति से जोड़ते हैं। अपने वक्तव्य में उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि राजनीतिक सिद्धांत को पश्चिम से उधार लिए गए ढाँचों के बजाय भारत के जीवंत लोकतांत्रिक अनुभवों में निहित होना चाहिए। उन्होंने राजनीतिक कल्पनाशीलता के क्षरण, लोकतांत्रिक मानकों के कमजोर होने और सिद्धांत व राजनीतिक व्यवहार के बीच बढ़ती दूरी की सही पहचान की। उनका भाषण लोकतंत्र में व्याप्त नैतिक और संस्थागत पतन की ओर आकर्षित करता है।
हालाँकि, उनके पूरे वक्तव्य में मुझे कहीं भी राजनीतिक अर्थव्यवस्था का संदर्भ नहीं मिला। जबकि समकालीन भारत को समझने के लिए कोई भी पर्याप्त राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक अर्थनीति को अपने केंद्र में रखे बिना अधूरा है। भारत में लोकतंत्र केवल नैतिक गिरावट का शिकार नहीं हो रहा है, बल्कि *इसे संरचनात्मक रूप से कॉरपोरेट–हिंदुत्व गठजोड़ द्वारा पुनर्गठित किया जा रहा है।* जो राज्य स्वायत्त होना चाहिए था, वह स्वयं इस गठजोड़ का हिस्सा बनता जा रहा है।
भारतीय राजनीतिक चिंतन कभी भी केवल नैतिक या संवैधानिक नहीं रहा है। यह उपनिवेशवाद, सामंतवाद, जाति उत्पीड़न और साम्राज्यवादी वर्चस्व के खिलाफ संघर्षों के बीच गढ़ा गया है। आंबेडकर ने संविधान को संघर्ष के औज़ार के रूप में देखा। गांधी की राजनीतिक नैतिकता, उपनिवेश-विरोधी संघर्ष से जुड़ी थी। मार्क्सवादी परंपरा ने लोकतंत्र को संघर्ष का मैदान माना। *भारतीय राजनीतिक सिद्धांत हमेशा टकरावपूर्ण, जोखिम उठाने वाला और वर्चस्व-विरोधी रहा है।*
ऐसे समय में जब भारतीय राज्य खुलकर हिंदुत्व और पूंजी के हितों की सेवा कर रही है, भारतीय राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ केवल शब्दावली में बदलाव नहीं हो सकता। उसे जन लोकतंत्र और समावेशी राष्ट्रवाद के लिए एक व्यापक जन-लोकतांत्रिक योजना से जुड़ना होगा।

अखिलेंद्र प्रताप सिंह
संस्थापक सदस्य, एआईपीएफ

दिनांक : 6 जनवरी, 2026